पाप की पुण्य......?

22/02/2010 13:45

त्तर प्रदेश के गोंडा जिला के एगो छोटहन गाँव गंडाही से थोड़ा दूर शाम के लगभग ५-६ बजे रमेश एगो छोटहन पुल प बईठल रहे, शाम के समय सूर्य के लालिमा पक्षिम के ओर धीरे धीरे गहरा होत चल जात रहेचिरई चुरुंग भी चहचहाहट के साथ अपना अपना घोसला के ओर उङल चल जात रहन स I रमेश बहुत दिन बाद अपना गाँव के इ प्रकृति सौंदर्य के मगन होके मह्सुश करत रहे, आसमान से लेके बाग़ बगीचा पेड़ पौधा देखत-देखत सामने बनल पुल प बइठ  गइल, ओह पुल प उकेरल कुछ शब्दन के ध्यान से देखे लागल, आ बार बार ओकरा के दोहरावे लागल I पुल एगो छोटहन नदी प बनल रहे जेकर पानी रमेश के ही गाँव के खेती आ जानवर के धोवे, पियावे के काम आवत रहे I उ पुल कई साल से टूटल पड़ल रहे जेकरा वजह से आवे जावे वाला हर कोई के परेशानी होत रहे, खासकर खेती किसानी के समय में... रमेश के गाँव के हर कोई ग्राम पंचायत, मुखिया वगैरह के तरह तरह से कोसत रहस, आ जे ना कोस पावत रहे उ ओह पुल के देखके ओकरे जुबानी समझ जात रहे I रमेश आज उ पुल के देख के बहुत खुश रहे, जवन ओह पुल प लिखल रहे ओकरा के त उ हरदम अईसही बईठ के देखत आ पढ़त रहल चाहत रहे I तबतक ओकर मोबाइल फ़ोन बाज़ल रिंग टोन भी लगवले रहे - '' साथी ना समझ कोई बात नहीं, मुझे साथ तो आने दे.......!'' अब रमेश के ध्यान ओह पुल प से हट के ओकरा सेल फ़ोन प गईल, उ आवे वाला नंबर के एक बार ध्यान से देखलस, आ एक बार मुस्कुरईलस फिर कान त लगा के कहलस हेल्लो......! '' कईसन बाड़sअ राज कुमार आज तोहके हमार याद आ गईल ना ?'' फ़ोन करे वाला राज कुमार रहे जवन की रमेश के जिगरी दोस्त रहे दुनो में खूब गहरा दोस्ती रहे, दुनो एकही जगह चंडीगढ़ मेंएकही कंपनी में काम करत रहन आ दुनो जने Colleague रहन I रमेश ही राज कुमार के काम लगावे में मदद कईले रहे, तबसे राज कुमार रमेश के आपन सगा भाई से भी बढ़ के मानत रहे
'' काहे ना आई रमेश भाई, तू इ काहे पूछsल ह की याद आ गईल ना ? हम तोहरा के कब याद ना कईले हई ? हमहू तोहरे लेखा बेवफा बन गईल बानी का ? - राज कुमार शिकायत भरल लहजे से ही रमेश से कहलस I
'' अरे ना भाई तोहार नाराजगी त ठीके बा बाकी हम बेवफा कैसे हो गईनी ? - रमेश राज कुमार से पुछलस I
'' जब हम शादी करके गाँव से अइनी त पता चलल की तू त नौकरी छोड़ के अपना घर चल गईलs, आ तू हमके इतना गैर बना देलs की हम से कुछ भी ना बतवलs काहे रमेश भाई का बात बा ? हम के त कुछ सीरिअस बात लागत बा तोहरा अतना जल्दी घरे जाए के पीछे कुछ ना कुछ जरुर बात बा तू हमके त कुछ बता देतs'' - राज कुमार रमेश के अचानक नौकरी छोड़ के घर आ जाये के बारे में जाने के कोशिश करे लागल रहे I
'' अरे ना राज कुमार भाई अइसन कोई बात नइखे अभी त हाल समाचार होइए नु गइल, आ फिर तोहार फ़ोन में पईसा लागत होई फिर कभी मुलाकात होई त तोह के जरुर बताइब ''- रमेश राज कुमार के शवालन से पीछा छोड़ावे के कोशिश में बोलल I बाकी राज कुमार रहे की रमेश से ओकर नौकरी छोड़े के कारन जाने के जिद ही पकड़ लेले रहे I
'' रमेश भाई तू त जानत बाड़ की हमार फ़ोन प्रीपेड ना पोस्टपेड ह आ उहो कंपनी के औनरशिप में बा तू पईसा लागे के चिंता  जिन करs तोहके आपन दोस्ती के कसम बा तू हमके सब कुछ साफ़ साफ़ बता के आपन उपर गिरल दुःख के पहाड़ के कुछ हल्का करलs हम तोहार दोस्त हई हम जरुर कोशिश करब की हम तोहरा कुछ काम आ जाई'' - राज कुमार रमेश से कहलस I रमेश के अब त दोस्ती के कसम के आगे झुके के ही पडल आ उ अब कमजोर होत चल गइल, आ राज कुमार से कहलस की तू त अब ना मनबs दोस्ती के कसम दे ही दिहलs त सुनs I आ फिर उ आपन अतीत में खोवत चल गइल आ आप बीती राज कुमार के सुनावत चल गइल I
'' राज कुमार बात आज से चार महिना पाहिले के ह एक दिन हम सरकारी हॉस्पिटल में गइल रहनी, ओहिजा हमनी के पड़ोस में रहे वाली एगो औरत मिलल उ आपन चेक अप करावे खातिर लाइन में खड़ा रहे आ उ कुछ परेसानी में रहे, काहे से की उ प्रेग्नेंट रहे एह चलते ओकरा लाइन में खड़ा होखल ना जात रहे I हमारा ओकरा के देखके अच्छा ना लागल हम ओकरा पास जाके ओकर कुछ मदद करे के कहनी त उ पहले त कुछ सोचलस, बाकी बाद में कहलस की ठीक बा रउवा हमके डॉक्टर से मिलवा दी ! हम ओके ओहिजे कुर्सी प बइठा के हम डॉक्टर से सीरिअस बता के मिलवा देनी, ओकर सारा चेक अप करावा देनी, डॉक्टर ओकरा के १०-१५ दिन के अंदर ही डेलिवेरी होखे वाला बा कहलस आ १०वे दिन भर्ती हो जाये के हिदायत दिहलस I ओकरा बाद हम ओके टेम्पू पकड़ा दिहनी उ अपना घरे चल गइल हम आपन ऑफिस चल अइनी I ठीक एक हपता बाद ओकर घरवाला हमारा कंपनी में आइल आ हमार फ़ोन नंबर लिहलस आ कुछ मदद करे के आग्रह कइलस, हमरा ओके घर के परिस्थिति मालुम रहे उ बेचारा मुस्किल से आपन परिवार चला पावत रहे, हमरा ना रहल गइल हम ओकरा के मदद करके सत्वाव्ना दे दिहनी, साथ ही ५०० रुपया भी दे दिहनी आ और कुछ जरुरत पड़ी त बेहिचक कहे के भी कह दिहनी उ ओह दिन हमार धन्यवाद करके चल गइल I ''
६ दिसंबर २०१० के हमरा सेल फ़ोन प फ़ोन आइल हम फ़ोन रिसीव कइनी त पता चलल की उ बाप बन गइल बा, ओकरा घर में लईका भइल बा हम ओकरा के मुबारक बाद दिहनी आ सब कुछ ठीक ठाक हो गइल रहे जान के आपन ख़ुशी व्यक्त करतही रहीं की........ उ जलदिये में हमरा के तनीका समय निकाल के हॉस्पिटल में आवे के कहलस आ फ़ोन काट दिहलस I हम ओकर फ़ोन नंबर मिलवनी.... बाकी इ सोच के काट दिहनी की शायद कोई ओके जरुरी काम पड़ गइल होखी एहिसे फ़ोन काट दिहले होखी I दूसरा दिन हम हॉस्पिटल में गइनी ओकर लईका के जनम प्रमाण पत्र बनवाके ओकर औरत के छुट्टी करवाके, डॉक्टर जइसे-जइसे लईका के दूध दवाई, ओकर माई के दूध दवाई कहले बतवले रहे उ सब हम ओहनी दुनो के बता के हम अपना ऑफिस चल अइनी, उहो दुनो टेम्पू लेके अपना घरे चल गइलन स I
१४ दिसम्बर के ओकर फिर फ़ोन आइल, आ उ कुछ रुआंसी आवाज़ में कहे लागल की '' भाई साहब हमार लईका के बहुत तबियत खराब बा उ सेक्टर ३२ चंडीगढ़ के हॉस्पिटल में भर्ती बा अगर रउवा जाके देख लेती त बड़ा मेहरबानी होइत'' हम ओके इ बात प टोकनी की भाई साहब तू हमसे इ बाकाहे कहत बाड़s हमहू कुछ काम करत बानी तू खुदे जईतs त ठीक रहित नु'' उ कहे लागल की '' हमार मालिक हमके छुट्टी नइखे देत आ देत बा त कहत बा की हम ४ दिन के पइसा काट लेब एहसे हम रउवा से निहोरा करत बानी, अगर रउवा हमार मदद करत बानी त राउर बड़ी मेहरबानी होखी''  हम ओके कहनी '' भाई साहब देखि हमरा समय मिली त हम जरुर चल जाइब ना त हम तोहके फ़ोन कर देहम'' आ कहके फ़ोन काट दिहनी I '' राज कुमार तू त जानतही बाङs की हमार औरत भीरी उल्टा खोपड़ी आ नारात्मक सोच विचार के गठरी हमेशा तइयार रहेला, एहसे अब हम त खुद ओकर लईका के देखे जायेके रास्ता खोजे खातिर नारात्मक बात के ही सहारा ले लिहनी, आ हम हॉस्पिटल में चल गइनी ओहिजा जा के देखनी त ओकर औरत लईका के लेके रोवत रहे आ ओकर लईका के इलाज ना होत रहे, लईका के बहुत बुरा हाल रहे सरकारी हॉस्पिटल के सरकारी डॉक्टरवन से बहस कइके ओकर लईका के भर्ती करवनी फिर फ़ोन करके ओकर घरवाला के जल्दी बोला लेनी कहे से की अब त रात में रुके के नु पड़ित I /२ घंटा बाद ओकर घरवाला आ गइल हम ओकरा के सब कुछ दवाई आ खिलाई पिलाई के बारे में समझा दिहनी आ घरे आ गइनी I
एक महिना के बाद हमरा पास ओकर फ़ोन आइल आ फ़ोन प कहे लागल - '' भाई साहब हम के एगो कमरा ढूंढ़ के दिला दी हम इ कमरा खाली करेके सोचत बानी''  हम ओकर कारन पूछनी त साफ़ साफ़ बतावे में थोडा सा हिचकिचाईल'' हमहू इ सोच के जादा जोर ना दिहनी की हो सकता ओकर कवनो व्यक्तिगत समस्या होखी, आ १२०० रूपया किराया प एगो मकान ढूंढ़ के दिला दिहनी I उ आपन सामान १ फ़रवरी के शिफ्ट कर लिहलक I इतेफाक अइसन रहे की हम जवन रास्ता से ड्यूटी जात रहनी ओही रास्ता में ओकर मकान पडत रहे, एक दिन ओकर घरवाली सुबह तार प गिला कपड़ा पसारत रहे उ हमके ड्यूटी जात देख लिहलस, दूसरा दिन ओकर घरवाला हमके फ़ोन कईलस आ कहलस - '' भाई साहब आज रउवा छुट्टी क के हमरा कमरा प आइब''  हम ओकरा से कारण पूछनी त कहे लागल की  - '' कोई खास बात नईखे असही कहनी ह का रउवा हमरा कमरा प नइखी आ सकत का ? '' अरे काहे ना भाई साहब रउवा बोलाइब काहे ना आइब बाकी कवनो काम होखे तब नु आवत जात नीक लागेला चलीं ठीक बा सांझी के हम जरुर कोशिश करब हम कहनी I आ शाम के ६ बजे छुट्टी के बाद हम ओकरा कमरा प गइनी, उ चाय, मैगी बनवा के रखले रहे हम चाय त ना पीही बाकी मैगी खइनी आ ओकरे साथे अपना घरे चल अइनी I
 समय अपना गति से गुजरत जात रहे उ लोग अपना दुनियाँ में खुश रहे आ हम अपना दुनियाँ में, लगभग एक हपता के बाद एक दिन हम १ बजे  खाना खाय खातिर कैंटीन में जात रही की ओकर फ़ोन आइल आ काहे लागल - '' भाई साहब आज हमरा कमरा प मिटटी के तेल ना होखे के वजह से खाना नइखे बनल सुबह चाय आ बिस्कुट खाके हम त ड्यूटी आ गइल बानी, पता ना उ (घरवाली) कुछ खइले बिया की ना तानीका फ़ोन क के पूछ लेहब''  '' हम ओकरा से कहनी भाई साहब राउर पूछल जरुरी बा की हमार हमरा के रउवा इ पूछे के काहे कहत बानी ?'' त उ काहे लागल - '' हमरा फ़ोन में पईसा नइखे एहसे रउवा से कहत रहनी ह I'' '' चलीं ठीक बा हमही पूछ लेत बानी हम कहनी '' हम ओकर घरवाली के फ़ोन लगवनी ''हैल्लो  के बोलsता  ओने से आवाज आइल....! हम ओकरा से पूछनी '' रउवा के बोलत बनी? सुषमा.... ! आ रउवा के... ? हमरा से पुछलस, हमहू अपना बारे में बतवनी आ इ कहनी की - '' पंडी जी हमरा के कहनी ह फ़ोन करे के एहसे हम फ़ोन कइले बानी रउवा खाना का बनवले बानी ? '' रोटी, चावल, दाल, सब्जी,..........'' अउर पता ना का का बतावे लागल हम कहनी - '' त ठीक बा रउवा खाना खा लेहब I फिर हम ओकर घरवाला के ओसही बता दिहनी जैसे उ हमरा के बतइले रहे, त उ लागल हसे आ कहलस की - '' ना भाई साहब उ रउवा से झुठहू के कहत बिया I''
त अब बताई अब हम का करी ? हम ओकरा से पूछनी, त उ कुछ सोचे लागल..... उ कुछ कहित तबतक हमही ओकरा से कहनी की - '' रउवा हमरा भीरी आ जाई हम रउवा के कैंटीन से खाना लेके दे देत बानी रउवा जाके उनका के दे दिही'' '' कईसे आई भाई साहब हमरा छुट्टीए नइखे मीलत ना त हमही एहिजा से खाना लेके चल जइती, कुछ सोच के चलीं छोड़ी कवनो बात नइखे हम शाम के खाना लेके जाइब उ कहलस I''  हमरा रहल ना गइल हम कहनी - '' भाई साहब उ पूरा दिन भूखे रहीहन त बच्चा दूध कहा से पीही हम खाना भेजवा दिही?'' '' बड़ी मेहरबानी होई भाई साहब रउवा हमेसा हमरा मज़बूरी में तैयार रहनी - उ कहे लागल I'' 

 

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'' भाई साहब कुछ उम्मीद आ भरोसा कइके नु रउवा हमरा के याद करेनी एहिसे हमरो से जेतना हो सकेला हम रउवा के मदद करे से इनकार न करी'' हम कहनी उ फिर हमरा के धन्यबाद दिहलक आ ओकर फ़ोन कट गइल I हम अपना कंपनी के कैंटीन से खाना पैक करा के ओकरा कमरा प भिजवा दिहनी, दुसरका दिन ओकर फिर फ़ोन आइल अबकी उ हमरा के १ बजे खाना खाए खातिर अपना कमरा प बोलsवलस त हम काम जादा आ ना सकत बानी कही के माना कर देनी बाकी उ जिद करे लागल त हम समय मिली त जरुर आ जाइब कह के फ़ोन काट दिहनी I

 उ कुछ दिन पहिले हमार पडोसी रहे बाकी ओकरा से जादा जान पहचान ना रहुवे, जात के ब्रह्मण नाम रमेश उ पढ़ल लिखल ना रहे घर से तीन किलो मीटर दूर एगो होटल में कुक के नौकरी करत रहे हम बस ओकरा बारे में अतने जानत रहनी, ओकर हमरा प्रति इतना लगाव आ मदद के उम्मीद से अब हमरा माथा में कुछ ठनके लागल हमरा ओकरा साथे बिना जान पहचान के एतना लगाव आ नजदीकी बढावल कुछ ठीक ना बुझाइल I इहे सब सोचत रहनी की मोबाइल के घंटी फिर बाजल बिना नंबर देखले हम मोबाइल कान त लगा के बोलनी - हैल्लो....! '' १ बज गइल भाई साहब हम राउर इन्जार करत बानी जल्दी आ जाई ओने से आवाज आइल I'' '' ह...! ह...! ठीक बा थोड़ी देर में आवत बानी...!''  आनन फानन में कही के हम फ़ोन काट दिहनी आ कैंटीन में जाके दू आदमी के खाना पैक करवा लेनी I ओकर कमरा प हमरा हाथ में खाना के थईला देख के - '' अरे भाई साहब हम राउर खाना त बनववले ही रही रउवा खाना काहे लेके अइनी ह '' उ कहलस, '' कोई बात ना भाई जी इनकरो के ओही सब में मिला के खा जाइल जाई '' हम ओकरा से कहनी, खाना खाते खाते पता चलल की ओकर ३८०० रुपया तनख्वाह बा आ ड्यूटी सुबह ७ बजे से लेके रत के ११ बजे तक करला I आ फिर उ हमरा से कवनो दोसर काम लगवावे के काहे लागल जवना में पइसा भी ठीक होखो आ समय से छुट्टी भी मिल जाए हम ओकरा के कोशिश करब कही के ऑफिस चल अइनी I ओकरा १०-१२ दिन बाद हमरा फ़ोन प कही से फ़ोन आइल हम रिसीव कइनी त पता चलल की ओने से कवनो श्रवन नाम के आदमी बोलत बा उ पहिले त हमरा से हमार हाल चाल पुछलस, हमहू सब ठीके बा कहिके ओकरा से पूछनी की - '' हमरा से रउवा का काम बा भाई जी कइसे फ़ोन कइले बाङs आ हमार नंबर तोह के कईसे मिलल ?''  '' कुछ ख़ास ना बस असही रउवा से कुछ बतियावे के मन करत रहे एह से कइनी ह उ कहलस I''  '' त ठीके बा बतियावs का बतियावल चाहत बाङs ?'' हम फिर से ओकरा से शवाल कइनी I

फ़ोन प उ आदमी हमरा से जवन बात कहे के सुरु कईलस उ बात से हमार त पारा गरम हो गइल आ एका एक हमरा मुह से निकल ''ए...भाई....ए....सनकल त नइखs नु अब आपन बकवास बंद करबs की हमरा से कुछ सुनल चाहत बाड़s.....अतना सुनते उ कहलस की '' भाई साहब राउर खिसिआइल जायज बा बाकी हमरा बात प रउवा के बिश्वास करे के पड़ी हम अइसन कइगो सुबूत रउवा के दे सकत बानी ''

'' उ आदमी अइसन का कहत रहे रमेश भाई जवना से तोहरा एतना रोष आ गइल'' - राजकुमार रमेश से पुछलस I

'' का कहीं हो राजकुमार भाई उ आदमी हमरा के अभी त बात बतावे के शुरूये क़ईले रहे तबे हमरा खींस बरे लागल बाकी फिर हम इ सोचनी की बिना कुछ जनले बुझले कोई केकरो बारे में अइसन बात त ना कहीं, आ हम ओकरा के अउर सब कुछ खुल के बतावे के कहनी मतलब ओकर बात सुने के हमार अउर उत्सुकता बढ़ नु गइल'' - रमेश राजकुमार से कहलस I

'' मलतब उ आदमी तोहरा घर के मामला में कुछ बोलत रहे का'' - राजकुमार पुछलस I    

" ना हो उ हमरा घर के मामला में ना उहे पंडीजी के घर के बारे में बतवलस, सबसे पहीले त कहता की,'' -  भाई साहब रउवा पंडीजी के औरत के चक्कर में कब से पडल बानी............मत पड़ी उ औरत बहुत खराब बिया ओकर पता ना कय गो से जान पहचान बा''  

 

 


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