तिपहरी जिन्दगी की

24/06/2010 13:28

 

ये दिन का तीनो वक्त है पुरुषो का I
शाम ढली रात स्त्रियो  की आएगी II
सुबह बाल पण दोपहर जवानी छाएगी I
शाम आई बुढ़ापा लेकर रात तन्हा कट जाएगी II
 
मै ढूंढ़ रहा वो शमां जो भजन भाव बताएगी I
पड़े निढाल हो जब बिछावन पर तो II
पीड़ दर्द बढ़ असहाय हुआ तो I
अब नित्य क्रिया भी उसी पे होएगी II
 
अपने ही ओलाद देख फटकारे I
छि: छि: कहे परयो सा दुत्कारे II
लगा नेह उम्र भर जिस स्त्री से I
पास फटकने वो भी नहीं आएगी II
 
कलह बन जाएगी कराह एक दिन I
पानी देते हुए स्त्री भी घिनाएगी II
स्वामी कह मनाये जग छोड़न को I
संग छोड़ कपूत मन भाएगी II
 
प्रभु प्रभु पुकार रहा अब मन I
प्राण पापी है की छोड़े नहीं तन II
जब तक रहा बुढ़ापे से दूर I
हाय संचय में लगा रहा मन    II
 
तन को न देख परख तू मन को I
रगड़े खूब नित्य नये  ले इत्र जैसे II
रगड़ बिन पानी साबुन मन को I
खड़ा अरण्य चन्दन जैसे II
 
छूटे प्राण संग चले सब कोई I
द्वार तक ही छोड़े रोते परजाई II
लगा कन्धा ले हरि का प्यारा नाम I
तू क्या सुने जब छोड़ चला भजन धाम II
 
पञ्च कर्मा कर मुख अग्नि दिया तो I
रोते सिसकते चुप हो गई II
तोड़  खंखनी शर्धांजलि दिया तो I
पोछा चक्शु अब मन भर गई II
 
कैसे प्रेमी कैसा पति अब I
न स्नेह रहा न रही वो सती अब II
भुला बिसरा सब बंद कर दी पाती I
संभालो समझ किसी पागल की थाती II
 
 
 
 
 
 

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