आधी ज़िन्दगी आधी मौत

24/08/2013 19:34

रमेश अस्पताल में बेहोश पड़ा था उसके पास उसके दोनों बच्चे निशा और सुरेश खड़े सिसक रहे थे I रमेश के गले का ऑपरेशन हुआ था वो अपनी जिन्दगी के कुछ आखिरी दिनों का सामना कर रहा था I डॉक्टर और रमेश के दोनों बच्चे रमेश के होश में आने का इंतजार कर रहे थे। डॉक्टर दोनों बच्चो को अपने पास बुलाते हुए उनका परिचय लेने लगे, निशा- मैं 14 साल की हुँ, मेरा भाई 11 साल का, कहती हुई निशा ने डॉक्टर से पुछा- पापा कब तक उठ जायेंगे डॉक्टर साहब? देखो बेटा बेहोशी की इंजेक्शन की मियाद तो चार घण्टे की है, दो घण्टे आपरेशन में लगे, एक घण्टे से हम इनके पास ही है, और एक घण्टे में आप के पापा होश में आ जायेंगे। कहते हुए डॉक्टर कमरे से बाहर जाने को उठ खड़े हुए। ठीक है डॉक्टर साहब-निशा ने कहा और अपने हाथ में पड़े डायरी को अपने सीने से मिंचति हुई सुरेश के कन्धे पकडे कमरे के बाहर पड़े कुर्सी पर आ कर बैठ गय। निशा ने फिर उस डायरी को पलटना शुरू किया जिसे उसे नर्स ने दिया था और कहा था- गुड़ियाँ डायरी तुम्हारे पापा के पास थी, और ऑपरेशन के लिए जाते समय मुझे कहकर गए थे की मैं आप को दे दूँ।

डायरी पलटते निशा एक जगह रुक गई और आगे पढ़ना शुरू किया- मेरे दोनों बच्चे छोटे थे निशा 6 साल की थी और सुरेश 3 साल का जब मेरे घर पहली बार पुलिस आई, उस दिन पुलिस मैं कुछ भी समझा सका ही उन्हें सच दिखा सका। उस दिन के बाद मेरा मन ये कहने लगा की मैं सब कुछ छोड़ कर ऐसी जगह चला जाऊ, जहाँ किसी भी तरह की हर-हर पट-पट हो, जिंदगी सुकुन से जिऊँ। पर मेरी नजर बच्चो पर पड़ी तो मन मसोस कर रह गया। अपने बच्चे को लेकर वहाँ से कहीं और या अपने गाँव आकर रहने के बारे में सोचने लगा। एक दिन मैं अपनी पत्नी को समझाने में कामयाब हो गया की, हमारे आपस में टयूनिंग मिलने और रोज-रोज झगड़े की वजह से हमारे बच्चो के ऊपर गलत असर पड़ेगा। हमे या तो बच्चे अलग रख कर पढ़ाना-लिखाना चाहिए या तु इन दोनों को लेकर घर जाकर रह। पर उस औरत ने घर जाकर रहने से साफ़ मना कर दिया, और कहने लगी की तुम्ही अपना और अपने बच्चो का रास्ता अलग कर लो। उसकी इस फैसले से मैंने भगवान को हजार बार शुक्रिया किया, और एक दिन बच्चो को लेकर अपने घर चला गया। तकरीबन दो साल बाद मेरी पत्नी को कानुन का ज्ञान हो जाने की वजह से बच्चो को उसके पास रखने पड़े। उस दिन बच्चो को उसके पास छोड़ते समय बच्चो के बिलखते चेहरे देखा मेरा सीना फटता रहा पर मैं क्या करता, ना मै उसके साथ रह सकता था और ना ही बच्चो को लेकर अलग रह कमा खा सकता था। उस औरत ने अपने औरत होने का भरपुर फ़ायदा उठाया और मुझे कही का नहीं छोड़ा। मैं उसके ऐसी व्यवहार के वजह से अपने बच्चो से दूर होता चला गया। वो मुझे तलाक देने को राजी नहीं, बिना तलाक मेरे बच्चे मेरे साथ रह नहीं सकते थे।

मैं अलग रह कर अपने बच्चो से सम्पर्क बनाए रखा उन्हें हमेशा ख़र्च, स्कूल का ख़र्च और अपने माँ-बाप के साथ अपना और दोनों बच्चो के बीच तालमेल बनाय रखा। इन्ही सब चिंताओ, परेशानियों के साथ लिए जिंदगी कटती रही। यही कोई एक साल बाद एक दिन मेरे दूर की रिस्ते की एक औरत मुझे मिली, उसके पति की मौत हो चुकी थी और उसके पास भी दो बच्चे थे, दोनों की उम्र मेरे बच्चो के ही समान थे। उस औरत नाम था गायत्री हम दोनों आपसी रजामन्दी से हमने एक- दुसरे के सुख-दुःख मिलकर बाँटने का फैसला कर लिया और भगवान, अग्नि को साक्षी मानकर एक साथ रहने लगे। मैं उन दोनों बच्चो में ही अपने दोनों बच्चो को देख उन्हें अपना बचा प्यार देता रहा, उनके हर दुःख-सुख को अपना समझ अपनो से ज्यादा करने की कोशिश करता रहा। गायत्री भी मुझे मेरे व्यवहार और परिवारिक परिस्थितियो के समझ की वजह से बहुत प्यार करने लगी। मैं अपना गम धीरे-धीरे भुलाता गया, और ये दिन हरदम ऐसे ही कटता रहे इसकी कामना करने लगा। जिंदगी हँसी-खुशी कटती चली गई, लगभग पाँच साल बाद एक दिन गायत्री मेरे अपने बच्चो से बात-चित और उनको ख़र्च आदि की लेनदेन को लेकर बहस करने लग गई। मैंने उसे साफ़ लब्जो में बता दिया की देखो मुझे तुम्हारे बच्चो से कोई दिक्कत नहीं तो तुम्हे मेरे बच्चो से भी कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। उस दिन तो गायत्री मेरी बातो से सहमत हो गई, पर वो मुझसे बाते कम करने लगी, मुझसे अक्सर कटी-कटी सी रहने लगी। हम दोनों के बीच अब वो बात नहीं रही जो कभी पाँच साल पहले शुरू हुई थी, और अब तक चली रही थी। गायत्री के दोनों बच्चे बड़े हो चले थे, उसके मेरे प्रति प्यार में भी उजड़ापन गया, वो मेरे प्रति लापरवाह हो गई। मैं एक बार फिर अपने पुराने जख्मो से उठते ठीस को महसुस करने लगा, कभी-कभी ऐसा लगता जैस मुझे इस जहाँ में भेजने वाले ने गृहस्थ जीवन के लिए नहीं बल्कि औरतो के हाथो का खिलौना बना कर भेजा है।

गायत्री के रूखेपन से मैं अंदर ही अंदर टूट गया। कभी-कभी सोचता इतना वफादार होते हुए मुझे दुनियाँ में किसी का वफा क्युँ नहीं मिली? मेरी अपनी औरत होते हुए भी गायत्री के पास मेहमान बन कर रहा। मेरे अपने बच्चे होते हुए मुझे पापा कहकर बुलाने वाला कोई नहीं दिखा। गायत्री के व्यवहार से मुझे वो दिन याद आने लगे जब किसी ने उस वक्त मुझसे कहाँ था - जब मैं गायत्री के साथ जिंदगी भर साथ निभाने के फैसले लेने जा रहा था - देख मेरे भाई भावनाओ के हाथो मजबुर सब कुछ तो तू ठीक ही कर रहा है, पर जिंदगी में जो अपना नहीं वो फिर जिंदगी भर सपना बन कर रह जाता है। पुरा दिन तो काम काज में मेरा मन लगा रहता और दिन भी कट जाता पर घर आते ही मेरे चैन उड़ जाते, गायत्री के बेरुखी से मैं धीरे-धीरे नशे का आदि होने लगा, और अब मैं भी चाहते हुए गायत्री और उसके दोनों बच्चो के प्रति गैर जिम्मेदार होता चला गया। एक दिन नशे में मैंने गायत्री से कुछ बात करना चाहा, बिना नशे में तो वो मेरी किसी भी बातो का हुँ, हाँ, ना, नहीं में जवाब दे असली मुदो को टाल जाती। मैंने कई बार अपनी गलतियों के बारे में उससे बात करनी चाही, और उन गलतियों के बारे में जान कर उन्हें सुधारने का वादा कर, उससे हम दोनों क बीच पैदा हुए विवादो को दूर करना चाहा। पर मैं ये भुल गया की जो औरत सिधे मन कुछ कहने सुनने को राजी नहीं वो नशे में रहते मुझसे क्या बाते करेगी? नशे में धुत उस दिन मैं अपने में गायत्री के लिए उमड़ते प्यार को- सिगरेट के उठते धुँए से जला चका था। उस दिन मैं तो जैसे अपने जिंदगी के उन 6 सालो का हिसाब माँगने को आतुर था जिसे उनके लिए सिर्फ उनके लिए जिया था। उस दिन तो मेरी आत्मा मुझे तब- तक झिंझोड़ती रही जब तक मैंने गायत्री से ये नहीं पुछ लिया की बता तुझे आज क्या हो गया, मैंने तेरा क्या बिगड़ दिया, जिस वजह से तुने मेरा जिना दुस्वार कर दिया I इस मुकाम पर लाकर जहाँ से आगे-पीछे कोई रास्ता नहीं बच जाता, जिस पर अकेले चलना मुमकिन हो।

अगर तुझे मेरे साथ यही करना था, तो क्युँ जिंदगी भर साथ निभाने के वादे किय, वो वादे तेरे कहाँ गय जब तु मेरे साथ तन्हाई में किया करती थी? बता आज तुझे मेरे हर शवाल का जवाब देना ही होगा। उस दिन जाने मैं क्या-क्या बड़बड़ाता रहा। गायत्री अपना सर झुकाए सब कुछ सुनती रही और कभी-कभार अपना सर उठाकर बच्चो को बाहर से आने को देखती रही जिन्हे मैंने दोनों को- थोड़ी देर बाद आना बेटा, मुझे तुम्हारी मम्मी से कुछ बात करनी है- कह कर बाहर भेज दिया था। फिर भी गायत्री मुझसे कुछ बात नहीं कर रही थी। मैंने फिर उसे दोनों हाथो को पकड़ जोर से उठाया और उसे झिंझोड़ते हुए चिल्लाया- मैं इतने देर से बक-बक किय जा रहा हुँ तेरी समझ में नहीं आ रहा है कुछ? बता तु आज मुझे पिछले एक साल मेरे साथ ये कौन सा खेल खेल रही है? मेरे कुछ भी कहने का गायत्री पर कोई असर नहीं हो रहा था, ना ही वो कुछ बताना चाहती थी। मैं तो जैसे उसके इस बेरूखेपन से पागल सा हो रहा था, उसकी इस कदर चुप्पी मुझे और बिचलित कर रही थी। अचानक मेरा हाथ उठा और उसके चेहरे पर जाकर जोर का पड़ा, चेहरा पकड़ वो शिसकने लगी और घबराई हुई सी बोली आज आप नशे में हो कल मैं आप को सारी बात बताऊँगी। ठीक है चल तु कल ही मुझे बताना लेकिन कल भी कुछ नहीं बताया तो मैं तुझे छोडुंगा नहीं याद रखना, मैंने अपने आप थोड़ा और टाइट करते हुए बोला। उस दिन के बाद मेरे गुमशुदगी में दो दिन और गुजर गय, मेरे गुस्से का पारा चढ़ते जा रहा था, लाजमी था मेरी जगह कोई और होता तो शायद वो तो सारी हदे पार कर चुका होता। तीसरे दिन उसने मुझे पार्क में चलने को कहा, मैं उसे लेकर पार्क में गया, वो एक चबूतरे पर बैठ गई और सर झुका कुछ सोचने लगी।

मैंने उसे खीचते हुए बोला तरी ये नौटंकी बहुत हो गई, चल अब दुसरे ड्रमो का डायलॉग बोलना शुरू कर। या कहने में शर्म आ रही है की मेरी जगह कोई दूसरा मर्द पसंद आ गया? बोल वर्ना- कहते हुए मैंने अपना हाथ एक बार फिर उस पर उठा लिया था। मैं आप से ये बात कहना तो नहीं चाहती थी पर मेरी मज़बूरी है- गायत्री ने कुछ  कहना शुरू किया। मुझे उसके चेहरे के भाव से पत्ता चला की वो शायद किसी कशमकश में है। उसके उस माशुमियत पर मेरा गुस्सा जाता रहा, मैं नम्र होकर बोला- देखो गायत्री मैंने आज तक तुम्हे, तुम्हारे दोनों बच्चो को कभी पराया समझा या परायो सा व्यवहार किया है? क्या मैं कभी अपनी जिम्मेदारी से भागना चाहा? गायत्रि मेरी तरफ देखती हुई बोली- नहीं मैंने कभी आप को ऐसा कुछ नहीं कहा। तो तुम्हारी क्या मज़बूरी है? मैंने अपनी बातो पर जरा जोर देकर बोला। उसके बाद गायत्री ने अपनी मज़बूरी बताना शुरू किया- मेरे घरवाले ( मायके ) कह रहे है की मैं आप के साथ न रहुँ, और मेरा बड़ा बेटा ( जो की अब- 14 साल का हो चुका था ) भी कहता है की, अब हम अपने घर चल कर रहे। तो क्या ये सब उस समय नहीं जानते थे? तुम्हारा बेटा आज जवान हो चला तो उसकी मेरे और तुम्हारे साथ रहने से अब नाक कट रही है? मैंने गायत्री को बीच में टोकते हुए बोला।

अब आप ही बताओ की मैं क्या करूँ - गायत्री रुआँसी होकर बोलती रही- मैं आप को छोड़ना नहीं चाहती पर मेरे पहले ससुराल से मुझे कुछ नहीं मिलेगा, मिले कोई बात नहीं, बच्चे वहीं जाकर रहना चाहते है जहाँ उनका गाँव है, मैं तो दोनों तरफ से फसी हुँ। किसको छोडु किसके साथ रहुँ? मेरे समझ में नहीं आ रहा है। गायत्री बोलती रही- अब आप ही बताओ की मैं क्या करू? मेरा बड़ा भाई कहता है, जैसा तेरे बच्चे कहते है वैसा कर- ठीक है ठीक है मैं समझ गया। मैंने उसे बीच में रोकते हुए बोला। मेरी समझ में सारी बात आ गई- ये भी एक दिन किसी ने मुझ से कहा था की जिस दिन तुम्हारे बच्चे समझदार और स्याने हो गय उसी दिन मेरा तुम्हारे पास रहना किसी को अच्छा नहीं लगेगा। बच्चे जब छोटे थे तब उन्हें पालने और खिलाने की बात थी तब किसी ने नहीं सोचा था की ये दिन भी एक आनेवाला है, खैर- जो भी होता है अच्छा ही होता है पर कही, कभी किसी को वो बात बुरा लग जाता है। मैंने कहा और उसे वही पार्क में छोड़कर घर आ गया।

उस दिन के बाद मेरे सीने में दर्द कुछ ज्यादा ही रहने लगा था, और उस दर्द को आराम देने के लिए मैं दो-चार घुंट चढ़ा लिया करता था। दो-चार के बाद धीरे-धीरे 5 -10 हो गया, फिर वो 5 - 10 घुंट 10 - 20 फिर पुरी बोतल, बोतल के बाद भी अब मुझे कही चैन नहीं मिला करता था। युँ ही वक्त धीरे-धीरे  महीनो का लम्बा कट गया और उन्ही दो महीनो में मुझे न जाने कब कैंसर ने आ जकड़ा था। उपर वाले, का शुक्रिया किया की चलो बेमतलब जिंदगी को किनारा लगाने का बहाना तो मिल गया, लेकिन जब मुझे ये ख्याल आया की मेरी लाश का क्या होगा तो थोड़ा गमगीन हो गया था, पर मैंने अपना माथा पिटा और खुद को ही डाँटता सा समझाने लगा - बेवकुफ जिंदगी की तलाश में दर-बदर भटकता रहा तो इतनी फिकर नहीं की, और अब अपनी लाश की इतनी फिकर हो रही है। एक रात जब मैं अपने ऑफिश से निकला तो एक दोस्त मिल गया जिसने मुझ से पिने का आग्रह किया, मैंने भी उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कह चल पड़ा की- कोई हम दम ना मिला जिंदगी में तो क्या जीना छोड़ दूँ? हम सफर मिले तुम राहे मयखाने तो पीना क्युँ छोड़ दूँ?

उस रात लड़खड़ाता हुआ मैं तकरीबन 11 बजे घर वापस आया था,मैंने दरवाजा खटखटाया तो दरवाजा खुलता चला गया। नशे में भी मुझे कुछ अजीब सा लगा, मेरे दिल ने मुझ से कहा शायद तुम्हारा इंतजार कर रही होगी गायत्री? हुँ इंतजार मुँह बनाता हुआ मैं अंदर दाखिल हुआ, तो गायत्री इंतजार में ही बैठी थी। मै चुप चाप अंदर दाखिल हुआ और एक बेग में कपड़े रखा, अपनी डायरी उठाई और चल पड़ा, तब तक गायत्री मेरी आगे आकर खड़ी हो गई और कहने लगी रात को कहाँ जा रहे हो खाना खाओ और सो जाओ कल सुबह जाना हो वहाँ चले जाना। खाना खाओ अब मैं इस घर में खाना तो क्या, एक पल ठहर भी नहीं सकता मुझे जाने दे- अपने सामने से उसे हटाते हुए मैं घर से बाहर निकल गया और चल पड़ा एक अनजाने मंजिल की ओर। मुझे ऐसा महसुश हुआ शायद गायत्री दरवाजे पर खड़ी मेरी ओर देखे जा रही थी, शायद वो मेरे पलट कर उसे देखने को सोच रही थी।- पर वो जानती थी, की जब मैं एक कदम उठा लिया तो न वापस नहीं आता हुँ नहीं पलट कर देखता हुँ, फिर भी वो इस इंतजार में दरवाजे पर क्युँ खडी रही? मेरे दिल दिमाग में कोई उत्तर नहीं सुझा।

छोड़ यार उसकी मर्जी जो करे, तु अपना रास्ता देखकर चल, कही फिर ठेस न लग जाए - मैंने अपने आप को समझाया और चलता रहा। रात को बस स्टैण्ड आया और दिल्ली की बस पकड़ा, दिल्ली पहुँच कर बस स्टैण्ड पर ही मैं सुबह का इंतजार करने लगा। मेरा इंतजार बस कुछ घण्टो में ही ख़त्म हो गया। सुबह होते ही मैं दिल्ली में रहे रहे करीबी को तलाशने का फैसला किया पर मैं किसी वजह से नकाम रहा। मैंने वही एक कमरा किराया पर लिया, रोजभरी की चीजे खरीद लाया और एक नौकरी की तलाश करने लगा। एक दिन मुझे एक फ़र्मा कम्पनी में एक स्टोर इंचार्ज की नौकरी मिल गई, मैं ज्यादा खुश इस बात से हुआ की चलो जीने के साथ पिने का भी जरिया मिल गया।

 

 

     

                                                                               

 

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